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माता का अँचल

CBSE Class 10 Hindi (Course A) • Kritika Part-2 • Prose (Gadya)

पाठ का सारांश (Summary/Context):

'माता का अँचल' (Mata Ka Aanchal) शिवपूजन सहाय द्वारा रचित उनके प्रसिद्ध आँचलिक उपन्यास 'देहाती दुनिया' का एक अंश है। यह पाठ 1930 के दशक के ग्रामीण भारत (Rural India) के बचपन की सजीव झाँकी प्रस्तुत करता है। इसमें लेखक (बचपन का नाम 'तारकेश्वरनाथ', जिसे प्यार से 'भोलानाथ' कहा जाता था) के बचपन के खेलों, पिता के साथ गहरे लगाव और आत्मीयता, सखाओं (दोस्तों) की मंडलियों और अंततः विपदा (संकट) के समय माँ की ममतामयी गोद में शरण लेने का मार्मिक वर्णन है। यह सिद्ध करता है कि बच्चे का पिता से चाहे जितना भी अधिक जुड़ाव क्यों न हो, लेकिन संकट के समय उसे जो शांति और सुरक्षा 'माता के आंचल' (Mother's lap) में मिलती है, वह कहीं और नहीं मिल सकती।

1. लेखक का परिचय (Author Introduction)

लेखक: शिवपूजन सहाय (Shivpujan Sahay)

शिवपूजन सहाय हिंदी साहित्य के प्रसिद्ध कथाकार (Storyteller) और संपादक थे। उनका जन्म 1893 ई. में बिहार के भोजपुर ज़िले के उन्वास गाँव में हुआ था। उन्होंने कई प्रसिद्ध पत्रिकाओं (जैसे 'मतवाला', 'जागरण', 'माधुरी') का संपादन किया। उनका उपन्यास 'देहाती दुनिया' हिंदी का पहला आँचलिक उपन्यास (Regional novel - जिसमें किसी विशेष ग्रामीण क्षेत्र की भाषा, संस्कृति और रहन-सहन का सजीव वर्णन हो) माना जाता है। उनकी भाषा में लोक-भाषा (bhojpuri/rural words) की मिठास और ठेठ ग्रामीण शब्दों का सुंदर प्रयोग मिलता है।

2. प्रमुख पात्र (Main Characters)

3. कहानी के प्रमुख घटनाक्रम (Key Events in the Story)

4. महत्वपूर्ण कथन एवं उनके अर्थ (Important Quotes)

"जब खाएगा बड़े-बड़े कौर, तब पाएगा दुनिया में ठौर"

= अर्थ: यह वाक्य भोलानाथ की माँ अपने पति (बाबूजी) को ताना मारते हुए कहती है। इसका अर्थ है कि जब बच्चा बड़े-बड़े कौर (निवाले/Bites) पेट भरकर खाएगा, तभी वह शारीरिक रूप से मजबूत (हृष्ट-पुष्ट) होगा और तभी वह इस दुनिया में आगे चलकर अपनी 'जगह' (ठौर/पहचान/सफलता) बना पाएगा। यह एक माँ की स्वाभाविक चिंता और ममता को दर्शाता है।

"चूहे के बिल में पानी उलीचने से साँप का निकलना"

= अर्थ: यह इस कहानी का निर्णायक (Turning point) प्रसंग है। बच्चे खेल-खेल में शरारत करते हुए चूहे के बिल में पानी डाल रहे थे, पर उसमें से मौत (साँप) निकल आई। इस घटना के कारण भोलानाथ को इतना भय (डर) लगता है कि वह अपने सबसे प्रिय साथी (पिता) को छोड़कर तुरंत माँ के पास पहुँचता है, जो यह सिद्ध करता है कि संसार का सबसे सुरक्षित आश्रय (Safe haven) 'माँ का आँचल' ही है।

BOARD EXAM QUESTIONS

प्रश्न 1: 'माता का अँचल' पाठ के आधार पर स्पष्ट कीजिए कि भोलानाथ का सबसे अधिक जुड़ाव (Attachment) पिता के साथ था, फिर भी संकट के समय वह पिता के पास न जाकर माता की शरण क्यों लेता है?

उत्तर: यह सत्य है कि भोलानाथ का अपने पिता से बहुत गहरा लगाव था। वह पिता के साथ ही सोता था, उठता था, पूजा करता था, नहाता था और उन्हीं के साथ खेलता भी था। माँ से उसका नाता केवल दूध पीने और खाना खाने तक ही सीमित था। परंतु 'साँप' के निकलने पर जब भयंकर संकट आया और वह डर के मारे लहूलुहान होकर भागा, तब पिताजी के आवाज़ देने पर भी वह उनके पास नहीं रुका। इसका मुख्य कारण यह है कि 'माँ का आँचल' सुरक्षा, शांति और असीम ममता का प्रतीक है। पिता चाहे जितना भी लाड़ लड़ा ले, लेकिन डर और घबराहट के समय बच्चे को जो वात्सल्य (तसल्ली) और सुरक्षित पनाह अपनी माँ की गोद (आँचल) में मिलती है, वह संसार में कहीं और नहीं मिल सकती।


प्रश्न 2: आपके विचार से भोलानाथ अपने साथियों को देखकर सिसकना (रोना) क्यों भूल जाता है?

उत्तर: बच्चे का स्वभाव बहुत ही चंचल और मासूम होता है। साथियों (दोस्तों) के बीच उसे अपनापन और आनंद मिलता है। जब भोलानाथ अपने पिताजी की गोद में बैठकर रोता-सिसकता बाहर आ रहा था, तब उसने देखा कि उसके सारे साथी मिलकर कोई मज़ेदार खेल खेल रहे हैं (या हुड़दंग कर रहे हैं)। दोस्तों के उत्साह (जोश) और खेल के प्रति स्वाभाविक आकर्षण को देखकर उसका बाल-मन तुरंत बदल गया और वह अपना सारा दर्द और रोना भूलकर 'बाल-समूह' (Peer group) में शामिल होने के लिए मचल उठा।


प्रश्न 3: पाठ में बच्चों की जो दुनिया रची गई है, वह आज के बच्चों की दुनिया से किस प्रकार अलग है?

उत्तर: पाठ 'माता का अँचल' 1930 के ग्रामीण परिवेश का वर्णन करता है। उस समय के बच्चों की दुनिया और आज (आधुनिक समय) के बच्चों की दुनिया में ज़मीन-आसमान का अंतर है:
1. खेल के साधन: उस समय बच्चे प्राकृतिक चीज़ों (धूल, मिट्टी, लकड़ी, पत्ते, दीये) से अपने खिलौने स्वयं बनाते थे। वे घरौंदा बनाते, बारात निकालते और खेती के खेल खेलते थे (जिसमें शारीरिक मेहनत थी)। आज के बच्चे मोबाइल, वीडियो गेम, इंटरनेट और कृत्रिम (प्लास्टिक) खिलौनों तक सीमित हो गए हैं।
2. सामूहिक व बाहरी खेल: उस समय बच्चे टोलियों (ग्रुप) में घर के बाहर धूल-मिट्टी में खेलते थे, जिससे उनका समाज से जुड़ाव होता था। आज के बच्चे अधिकतर अकेले और चारदीवारी (कमरे) के अंदर रहना पसंद करते हैं।
3. सुरक्षा और खुलापन: पुराने समय में गाँव में एक खुलापन था; बच्चे कहीं भी आ-जा सकते थे। आज के शहरी जीवन में सुरक्षा कारणों से बच्चों का बाहर घूमना और प्रकृति के निकट जाना बहुत कम हो गया है।


प्रश्न 4: भोलानाथ के पिताजी बच्चों के खेलों में क्यों शामिल होते थे? (संक्षेप में बताइए)

उत्तर: भोलानाथ के पिताजी बहुत ही स्नेही और बाल-सुलभ प्रकृति (Child-friendly nature) के व्यक्ति थे। वे बच्चों के मनोविज्ञान को गहरे से समझते थे। वे जानते थे कि बच्चे के सर्वांगीण विकास (Overall development) के लिए केवल अनुशासन देना ही काफी नहीं है, बल्कि 'दोस्त' बनकर उनके साथ खेलना भी ज़रूरी है। जब वे बच्चों के खेलों (जैसे दावत खाना या बारात देखना) में शामिल होकर एक 'बच्चे' की तरह व्यवहार करते थे, तो इससे भोलानाथ और उसके दोस्तों का उत्साह दोगुना हो जाता था और पिता-पुत्र के बीच का रिश्ता और अधिक गहरा व मित्रवत (Friendly) बन जाता था।